Thursday, January 22, 2015
आतंकवाद को लेकर पाकिस्तानी नीति और अमेरिका का व्यवहार
एक बहुत बड़ा प्रश्न आजकल तीन देशों में बहस का मुद्दा बना हुआ है । मुद्दा है पाकिस्तान में आतंकवाद और आतंकवादी । इसकी व्याख्या करना जरुरी है या इसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है या फिर अन्य देशों , ख़ासकर भारत में , आतंकवाद के हथियार से शिकार करने वाला शिकारी ? इन अन्य देशों की सूची में अफ़ग़ानिस्तान तो बहुत पहले जुड़ गया था लेकिन 9/11 के बाद अमेरिका का नाम भी इसमें जुड़ गया था । दरअसल आतंकवादियों की फ़ौज की जरुरत अमेरिका को भी रही है , क्योंकि उसे भी अन्य देशों में इस हथियार से अपने हिसाब से शिकार करना था । लेकिन अमेरिका के हिसाब से अन्य देशों की सूची में सोवियत रुस का नाम सबसे ऊपर था । यह जरुर है कि अमेरिका ने अपने देश में हथियारों के फलते फूलते उद्योग के बावजूद , आतंकवाद नाम का यह नया हथियार पाकिस्तान में आधार बना कर उत्पादित किया , वाशिंगटन डी सी में नहीं । वैसे पूरी स्थिति को समझने के लिये थोड़ा और पीछे जाना पड़ेगा ।
यह 1947 के काल और उससे पहले का इतिहास है । सोवियत रुस में सर्वहारा की क्रान्ति हो जाने के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मुख्य चिन्ता इस नये वैचारिक आन्दोलन के विजय रथ को सोवियत रुस की सीमाओं के भीतर ही रोक देने की थी । इस चिन्ता से ग्रेट गेम की रणनीति ने जन्म लिया । रणनीति साफ़ थी । रुस के आसपास के देशों में ब्रिटिश साम्राज्यवादी हितों की रक्षा कर सकने वाले शासक रहने चाहियें । इसी रणनीति के तहत इंग्लैंड ने पहली बार तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया , जबकि तिब्बत स्वतंत्र देश था और कभी चीन का हिस्सा नहीं रहा था । लेकिन ब्रिटेन की चिन्ता तो यह थी कि तिब्बत अपने बलबूते सोवियत रुस के प्रभाव को रोक नहीं पायेगा , लेकिन चीन इसे रोक सकता है । बाक़ी संकट काल में ब्रिटेन तो सहायता करेगा ही । ध्यान रहे उन दिनों चीन रुस विरोधी था और ब्रिटेन के प्रभाव क्षेत्र में आता था । इसी प्रकार उत्तर-पश्चिम में इस ग्रेट गेम में इरान और अफ़ग़ानिस्तान ब्रिटेन के स्वाभाविक साथी थे , जिन्हें भारत में सोवियत रुस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये बफर स्टेट का काम करना था ।
लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध ने सारा परिदृश्य ही बदल दिया । इसे इतिहास का संयोग ही कहना होगा कि इस युद्ध में सोवियत रुस को मित्र राष्ट्रों के खेमे में आना पड़ा । युद्ध के बाद विश्व राजनीति में ब्रिटेन का स्थान अमेरिका ने ले लिया और रुस का अपना एक अलग खेमा बन गया । लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण घटना थी ब्रिटेन का भारत से चले जाने का निर्णय । भारत से चले जाने के निर्णय से सारे समीकरण बदल गये थे । ग्रेट गेम की रणनीति जारी थी क्योंकि नई स्थिति में सोवियत रुस के प्रभाव के बढ़ने का ख़तरा और तेज़ हो गया था , लेकिन अब इसे भारत में रोकने के लिये इरान और अफ़ग़ानिस्तान की बजाय पाकिस्तान को मुख्य भूमिका निभानी थी । इसके लिये जरुरी था कि पाकिस्तान शक्तिशाली बने । शक्तिशाली वह तभी बन सकता था यदि आज का ख़ैबर पख्तूनख्वा प्रान्त और जम्मू कश्मीर उसमें शामिल किया जाता । जम्मू कश्मीर का गिलगित संभाग तो उसमें शामिल करना बहुत ही जरुरी था क्योंकि गिलगित तीन साम्राज्यों का मिलन स्थल था । चीन, रुस और अफ़ग़ानिस्तान । लेकिन ब्रिटेन की इस रणनीति में जम्मू कश्मीर के उस समय के शासक महाराजा हरि सिंह सबसे बड़ी दीवार बन गये । उन्होंने लार्ड माऊंटबेटन और जिन्ना के लाख समझाने डराने के बावजूद पाकिस्तान में शामिल होने से इन्कार कर दिया । तब ग्रेट गेम की रणनीति के अनुसार जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल करने का एक ही रास्ता बचता था , उस पर हमला करके उसे जीत लिया जाये । यदि पूरा जम्मू कश्मीर हड़पना संभव न हो तो कम से कम उसका उतना विभाजन तो कर दिया जाये जो भविष्य में पाकिस्तान के लिये लाभकारी हो । गिलगित पाकिस्तान में शामिल करवा दिया जाये और नौशहरा से लेकर पुँछ तक जम्मू की पट्टी भी पाकिस्तान में शामिल कर दी जाये ताकि पश्चिमी पाकिस्तान के प्रमुख नगरों को भविष्य के संभावित हमले से सुरक्षित करवा दिया जाये । २२ अक्तूबर १९४७ को जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तानी हमला इसी रणनीति का परिणाम था । गिलगित तो अंग्रेज़ों ने अपने आदमी मेजर ब्राऊन को आगे करके तुरन्त पाकिस्तान में शामिल करवा दिया । नौशहरा से जम्मू तक की पट्टी को युद्ध विराम के माध्यम से पाकिस्तान में ही रहने दिया । दुर्भाग्य से जम्मू कश्मीर के इस विभाजन में लार्ड माऊंटबेटन व शेख़ अब्दुल्ला का व्यवहारिक सहयोग तो है ही , पंडित नेहरु की भी इसमें भूमिका रही है ।( पंडित नेहरु का एक पत्र उपलब्ध है जिसमें उन्होंने कहा है कि वे गिलगित पाकिस्तान में चले जाने के लिये सहमत हो सकते हैं ) । यह पाकिस्तान , ब्रिटेन और अमेरिका का स्वाभाविक साथी बना । अमेरिका और ब्रिटेन ने जिस उद्देश्य के लिये पाकिस्तान को मज़बूत किया था , उसका प्रयोग उन्होंने उस वक़्त किया जब सचमुच सोवियत रुस ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया । उस वक़्त पाकिस्तान, अमेरिका के लिये रुस के ख़िलाफ़ युद्ध का लांचिंग पैड बना । अफ़ग़ानिस्तान में रुस को पराजित करने के उद्देश्य के लिये ही इस्लामी आतंकवाद और आतंकवादियों का हथियार तैयार किया गया । यह ठीक है कि यह हथियार रुस के ख़िलाफ़ बहुत कारागार सिद्ध हुआ , जिसके लिये अमेरिका अपनी पीठ थपथपा सकता है और पाकिस्तान को शाबाशी दे सकता है । लेकिन इसके तुरन्त बाद सोवियत रुस का भी पतन हो गया । उसने साम्यवादी रास्ते का त्याग कर दिया और सैकड़ों साल पहले जारशाही के दिनों में बंदी बनाये गये मध्य एशिया के सब देश भी मुक्त कर दिये । द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त शुरु हुये इस वैचारिक शीत युद्ध का इस प्रकार अन्त हुआ ।
लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तान की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया । ग्रेट गेम का अन्त तो हो ही गया था । अमेरिका ने पाकिस्तान के भीतर जो इस्लामी आतंकवाद और आतंकवादियों के हथियार तैयार किये थे , उसकी बहुत सी खेपें तो अभी भी पाकिस्तान में बची हुईं थीं । पाकिस्तान ने आतंकवाद के इस हथियार का प्रयोग भारत के ख़िलाफ़ करना शुरु कर दिया । जम्मू कश्मीर उसका विशेष निशाना बना । अमेरिका को इसमें भी कोई आपत्ति नहीं थी । क्योंकि इसके माध्यम से मौक़ा पड़ने पर , उन विषयों पर जिन पर भारत और अमेरिका के रास्ते अलग अलग हैं , यदि भारत की बाँह मरोड़ी जा सके तो अमेरिका को लाभ ही लाभ है । इसलिये अमेरिका , जम्मू कश्मीर में इस्लामी आतंकी गतिविधियों को आतंकवाद न कह कर उसकी जन संघर्ष के नाम पर नाना व्याख्याएँ करने लगा और बीच बीच में भारत को जन समस्याएँ कैसे सुलझाई जायें , इसका उपदेश देना भी शुरु कर दिया ।
लेकिन ९/११ ने सारा पासा पलट दिया । आतंकवाद और आतंकवादियों के ये हथियार अमेरिका के विश्व व्यापार केन्द्र पर भी हमला करने लगे । इतना ही नहीं विश्व व्यापार केन्द्र पर हमले का सूत्रधार ओसामा बिन लादेन, जिसे अमेरिका ने दुश्मन नम्बर एक घोषित कर रखा था , वह लम्बे अरसे तक पाकिस्तान में ही छिपा रहा । ज़ाहिर है ऐसा पाकिस्तान सरकार की इच्छा के बिना सम्भव नहीं था । पाकिस्तान इस मामले में अमेरिका के साथ ही लुका छिपी का खेलता रहा । पाकिस्तान की भूमिका और उपयोगिता पर प्रश्नचिन्ह लग गया ।
लेकिन इसके बावजूद अमेरिका आतंकवाद के साथ अपनी लडाई में पाकिस्तान को ही अपने साथ रखने की रणनीति पर चल रहा था । दरअसल अमेरिका अपनी लम्बी रणनीति में भारत को अपना स्वाभाविक साथी नहीं मान रहा था । अमेरिका भारत को सशक्त और विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं देखना चाहता था । यह लाबी नहीं चाहती थी कि भारत में कोई सशक्त और निर्णय लेने वाली सरकार बने । इन की रुचि यही रही कि भारत गठबन्धन राजनीति का ही शिकार रहे ताकि ऐसे निर्णय लेने में सक्षम न हो सके जो अमेरिका के वैश्विक हितों को प्रभावित कर सकें । इसलिये अमेरिका ,भारत में नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ वातावरण बनाने में प्रत्यक्ष परोक्ष रुप से लगा रहा । वीज़ा प्रकरण उसी का हिस्सा था । लेकिन तमाम विरोधों और षड्यंत्रों के बावजूद नरेन्द्र मोदी केवल जीते ही नहीं बल्कि तीन दशक बाद भारत में गठबन्धन की राजनीति का अन्त हुआ और दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया ।
यह भारत का एक नया रुप था । अभी तक भारत वही बोल रहा था जो १९४७ में और उससे पूर्व अंग्रेज़ शासक उसके लिये निर्धारित कर गये थे । नेहरु उस भारत के प्रतिनिधि थे । उन्हें सत्ता के हस्तांतरण से सिंहासन और वाणी मिली थी । यह वह वाणी नहीं थी जिसकी कल्पना विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द ने की थी । लेकिन नरेन्द्र मोदी के आने से वही भारत एक बार फिर अँगड़ाई लेने लगा था , जिसकी कल्पना गुरु गोविन्द सिंह , विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द ने की थी । अब अमेरिका को निर्णय करना था कि उसे इस नये भारत के साथ सहयोग करना है या फिर पाकिस्तान के साथ मिल कर आतंकवाद-आतंकवाद का वही पुराना खेल खेलते रहना है । पिछले कुछ मास से अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा , भारत को अधिमान देते दिखाई दे रहे हैं । वे छब्बीस जनवरी के दिन दिल्ली के इंडिया गेट पर होने वाले कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के नाते आ रहे हैं । अमेरिका के किसी राष्ट्रपति को पहली बार इस कार्यक्रम में बुलाया गया है । इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान को इससे कोफ़्त होती है । ऐसे हर अवसर पर वह अपनी कोफ़्त का प्रदर्शन जम्मू कश्मीर या कहीं अन्यत्र आतंकवादी घटना के माध्यम से करता रहा है । जब बिल क्लिंटन भारत में आये थे तो पाकिस्तानी आतंकवादियों ने कश्मीर घाटी में ३० से भी ज़्यादा सिक्खों-हिन्दुओं का क़त्ल करके अपना प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करवाया था । ऐसी घटनाओं के बावजूद अमेरिका इन घटनाओं को जम्मू कश्मीर को लेकर आपसी विवाद ही कहता रहा है ।
अब छन छन कर ख़बरें आ रहीं थीं कि ओबामा के भारत आगमन पर पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में कोई ऐसी ही वारदात करके अपना विरोध दर्ज करवा सकता है । जो ख़बरें भारत में छन छन कर आ रहीं थीं , ज़ाहिर है कि अमेरिका के पास वे अपने समग्र रुप में ही पहुँच रही होंगी । सेना के सूत्र बताते ही हैं कि २०० के आसपास दुर्दान्त आतंकवादी पाकिस्तान की सीमा में मोर्चा लगा कर बैठे हैं ताकि मौक़ा देख कर घुसपैठ कर सकें । पाकिस्तान पिछले कुछ अरसे से युद्ध विराम का उल्लंघन कर, नियंत्रण रेखा पर निरन्तर गोलाबारी कर ही रहा है । उधर पाकिस्तान के भीतर मुम्बई आक्रमण का सूत्रधार लखवी जेल से बाहर आने के कगार पर ही है । मुम्बई दंगों का सरगना दाऊद अब्राहम तो रह ही पाकिस्तान सरकार की देख रेखा में रहा है । लेकिन भारत में आतंकवाद को लेकर अमेरिका ने पहली बार पाकिस्तान ने चेतावनी दी है कि यदि ओबामा के भारत प्रवास के दौरान पाकिस्तान ने हिन्दुस्तान में कोई आतंकवाद की वारदात की , उसे इसके परिणाम भुगतने के लिये तैयार रहना चाहिये ।
इस के कुछ संकेत अपने आप स्पष्ट हैं । पहला संकेत तो यही है कि अमेरिका इसे अच्छी तरह जानता है कि भारत में आतंकवादी वारदातों के पीछे पाकिस्तान का हाथ है । दूसरा अमेरिका यह भी जानता है कि पाकिस्तान में , दूसरे देशों के ख़िलाफ़ आतंकवाद का प्रयोग राज्य की नीति का ही हिस्सा है । यह इसकी विदेश नीति का भाग है ।
शायद अमेरिका यह मान कर चलता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत प्रवास के दौरान यदि पाकिस्तान कोईँ आतंकी वारदात जम्मू कश्मीर या अन्य किसी प्रान्त में करता है तो वह भारत को तो चुनौती होगी ही , लेकिन सबसे बढ़ कर तो वह अमेरिका को ही चुनौती मानी जायेगी । इसलिये उसने इस चेतावनी से चुनौती का जबाव दे दिया है । लेकिन चेतावनी एक सीमित समय के लिये दी गई है । वह समय केवल उन तीन दिनों के लिये है , जब तक ओबामा भारत में रहेंगे । यह किसी शरारती बच्चे को डाँटने जैसा ही है कि ख़बरदार जब तक बड़े साहिब आसपास हैं तब तक कोई शरारत मत करना । उसके बाद पाकिस्तान अपनी आतंकी गतिविधियाँ फिर जारी कर सकता है ।
फ़िलहाल अमेरिका ने भारत में पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों को लेकर , अपनी नीति का ख़ुलासा कर दिया है । यह ठीक है कि पाकिस्तान की आतंकवाद की रणनीति की काट भारत को स्वयं ही खोजनी होगी । इसके लिये अमेरिका पर निर्भर रहना उचित नहीं होगा । इस दिशा में उसने कुछ क़दम उठाये भी हैं । पाकिस्तान के विदेश मंत्री हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं से दिल्ली में आकर मिलेंगे तो भारत पाकिस्तान के साथ कोई बात नहीं करेगा -ऐसा संकेत दिल्ली ने इस्लामाबाद को दिया ही है । प्रधानमंत्री ने स्वयं भी हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं से मिलने से इंकार कर दिया । पाकिस्तान सीमा पर गोलीबारी करता है तो उसका जबाव उसी की भाषा में दिया जा रहा है । लेकिन प्रश्न तो अमेरिका की आतंकवाद को लेकर नीति का है ? क्या वह अभी भी पाकिस्तान के साथ मिल कर ही आतंकवाद से लड़ने की नीति पर चलता रहेगा और इसी बात से प्रसन्न होता रहेगा कि पेशावर कांड के बाद पाकिस्तान ने आतंकवादियों को फाँसी पर लटकाना शुरु कर दिया है । जो आतंकवादी पाकिस्तान सरकार पर हमला करें , वे तो बुरे आतंकवादी हैं और उन्हें फाँसी पर लटका देना चाहिये , लेकिन जो इस्लामाबाद या किसी और के इशारे पर अन्य देशों में आतंकी वारदातें करें , उन्हें शाबाशी दी जानी चाहिये , यह दोहरा मापदंड तो नहीं चल सकता । अमेरिका को स्पष्ट करना चाहिये कि पाकिस्तान यदि किसी देश में आतंकी कार्यवाही करता है तो उसे ज़िम्मेदार ठहराया जायेगा । निकट भविष्य में अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति को देखते हुये , ऐसा निर्णय लेना और भी जरुरी है । पाकिस्तान की आतंकी वारदातों को ओबामा के प्रवास के साथ जोड़ कर नीति बनाना , कहीं न कहीं अमेरिका के दोहरे चरित्र को ही उजागर करता है ।
Saturday, January 10, 2015
Monday, January 5, 2015
भारतीय साहित्य में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं जो हमारे जीवन में प्रेरणा–स्त्रोत बन जाते हैं और अनजाने ही हमें एक ऐसा संदेश भी दे जाते हैं जो हमारे संस्कारों को भी परिष्कृत करता है। एक ऐसा ही प्रसंग स्वामी विवेकानंद के संदर्भ में आज भी हमें भावविह्वल कर जाता है। बात उस समय की है, जब विवेकानंद जी को शिकागो की धर्मसभा में भारतीय संस्कृति पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। वे भारत के प्रथम संत थे जिन्हें अंतरराष्ट्रीय सर्वधर्म सभा में प्रवचन देने हेतु आमंत्रित किया गया था।
स्वामी विवेकानंद के गुरू रामकृष्ण परमहंस का देहांत हो चुका था। इसलिए इस महती यात्रा पर जाने से पूर्व उन्होंने गुरू मां शारदा ह्यस्वामी रामकृष्ण परमहंस की धर्मपत्नीहृ से आशीर्वाद लेना आवश्यक समझा। वे गुरू मां के पास गये, उनके चरण स्पर्श किये और उन्हें अपना मंतव्य बताते हुए बोले, "मां, मुझे भारतीय संस्कृति पर बोलने के लिए अमरीका से आमंत्रण मिला है। मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए ताकि मैं अपने प्रयोजन में सफल हो सकूं।"
मां शारदा ने अधरों पर मधुर स्मित लाते हुए कहा, "आशीर्वाद के लिए कल आना। मैं पहले देख लूंगी कि तुम्हारी पात्रता है भी या नहीं? और बिना सोचे–विचारे मैं आशीर्वाद नहीं दिया करती हूं।"
विवेकानंदजी सोच में पड़ गये, मगर गुरू मां के आदेश का पालन करते हुए दूसरे दिन फिर उनके सम्मुख उपस्थित हो गये। मां शारद रसोईघर में थीं।
विवेकानंदजी ने कहा, "मां मैं आशीर्वाद लेने आया हूं।"
"ठीक है आशीर्वाद तो तुझे मैं सोच–समझकर दूंगी। पहले तू मुझे वो चाकू उठाकर दे दे मुझे सब्जी काटनी है।" मां शारदा ने कहा।
विवेकानंदजी ने चाकू उठाया और विनम्रतापूर्वक मां शारदा की ओर बढ़ाया। चाकू लेते हुए ही मां शारदा ने अपने स्निग्ध आशीर्वचनों से स्वामी विवेकानंद को नहला–सा दिया। वे बोलीं, "जाओ नरेन्द्र मेरे समस्त आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं। तुम अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफलता प्राप्त करोगे।
तुम्हारी सफलता में मुझे कोई संदेह नहीं रहा है।"
स्वामीजी हतप्रभ। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि गुरू मां के आशीर्वाद और मेरे चाकू उठाने के बीच ऐसा क्या घटित हो गया? शंका निवारण के प्रयोजन से उन्होंने गुरू मां से पूछ ही लिया, "आपने आशीर्वाद देने से पहले मुझसे चाकू क्यों उठवाया था?"
"तुम्हारा मन देखने के लिए।" मां शारदा ने कहा, "प्रायः जब भी किसी व्यक्ति से चाकू मांगा जाता है तो वह चाकू की मूठ अपनी हथेली में समो लेता है और चाकू की तेज फाल दूसरे के समक्ष करता है। मगर तुमने ऐसा नहीं किया। तुमने चाकू की फाल अपनी हथेली में रखी और मूठवाला सिरा मेरी तरफ बढ़ाया।
यही तो साधु का मन होता है, जो सारी आपदा को स्वयं झेलकर भी दूसरे को सुख ही प्रदान करना चाहता है। वह भूल से भी किसी को कष्ट नहीं देना चाहता। अगर तुम साधुमन नहीं होते तो तुम्हारी हथेली में भी चाकू की मूठ होती, फल नहीं।"
Sunday, January 4, 2015
दिल्ली का शीतकालीन संघ शिक्षा वर्ग (प्रथम वर्ष) संपन्न
झिंझोली (सोनीपत), 3 जनवरी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शाखाओं के माध्यम से, जनजागरण के छोटे छोटे कार्यक्रमों के जरिये व्यक्ति निर्माण का कार्य 1925 से कर रहा है. संघ का उद्देश्य भारत को स्वावलंबी, सपंन्न, स्वाभिमानी, शक्तिशाली व सस्कांरित राष्ट्र बनाना है. यह बात संघ के उत्तर क्षेत्र के संघचालक श्री बजरंग लाल गुप्त ने कही. वे संघ की दिल्ली प्रांत इकाई द्वारा झिंझोली सोनीपत के इस साधना स्थली केन्द्र पर महाविद्यालय के छात्रों के प्रथम वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे.
14 दिसंबर 2014 से शुरू हुए इस संघ शिक्षा वर्ग में स्नातक स्तर के 84 शिक्षार्थी सम्मलित हुये. वर्ग में कुल 14 शिक्षकों समेत 25 कार्यकर्ता तीन सप्ताह तक इन शिक्षार्थियों के साथ शिक्षण कार्यक्रम में निरंतर लगे रहे. वर्ग को संघ के वरिष्ठ प्रचारकों का सान्निध्य भी मिला जिनमें क्षेत्रीय प्रचारक रामेश्वर, अ.भा.संपर्क प्रमुख अरुण कुमार, स्वदेशी जागरण मंच के कश्मीरी लाल जी शामिल हैं.
कार्यक्रम के अध्यक्ष डा. अजय दीवान ने, जो कि राजीव गॉधी कैंसर हॉस्पीटल के निदेशक हैं, अपने उद्धबोधन में कहा कि वे स्वयंसेवकों के शिक्षण को देख विस्मित हैं, यहां शारीरिक ही नहीं अपितु नैतिक शिक्षा का पूरा डोज़ दिया जाता है जो कि एक स्वस्थ व्यक्ति के लिये जरूरी है, जिसे चिकित्सा विज्ञान ने भी माना है. उन्होंने कहा कि आज के इस कार्यक्रम को देख उनकी सोच में बदलाव आया है. इससे पूर्व, वर्गाधिकारी श्री रविशेखर ने वर्ग का वृत्त प्रस्तुत किया. मंच पर दिल्ली प्रांत के संघचालक श्री कुलभूषण आहूजा व वर्गाधिकारी श्री मुन्नालाल जैन भी विराजमान थे.
नये शिक्षार्थियों द्वारा सुदंर शारीरिक प्रदर्शन व घोष का कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया. बेहद ठंड व बारिश होने के बावजूद कार्यक्रम में अच्छी संख्या में स्वानुशासित बच्चे, महिलायें व वयोवृद्ध नागरिक उपस्थित थे.










Friday, December 5, 2014
RSS Sarsanghchalak Dr. Mohan Rao Bhagwat expresses deep condolences Eminent Jurist Justice VR Krishna Iyer passes away in Kochi,
With the passing away of Justice V. R. Krishna Iyer we have lost a great jurist, who had made seminal contributions to turn our judicial system into a vehicle of social justice. A great humanist, he will ever be remembered for the gifts he had made to improve the quality of our social life. It was only recently I had an opportunity of meeting him, which was an invigorating experience for me. What appealed me the most was his sense of purpose and unadulterated love for all, An erudite scholar, he was content with simple ostentatious living. I send my heart-felt condolences to his family and all those who loved and adored him.
Vagish Issar (Ivsk Delhi) 09810068474
(sarve bhavantu sukhinah, sarve santu niramaya;
sarve bhadrani pashyantu, ma kashchit dukkh bhagbhavet}
Thursday, December 4, 2014
On Oct 21, 2013 RSS Sarsanghchalak Mohan Bhagwat met Justice VR Krishna Iyer at his residence in Kerala. (FILE PHOTO)
Eminent Jurist Justice VR Krishna Iyer passes away in Kochi, RSS expresses deep condolences
Kochi December 04, 2014: Former Supreme Court judge VR Krishna Iyer (100) passed away on Thursday at the age of 100 in a private hospital in Kochi, Kerala. Iyer was suffering from some kideny related problems and was admitted in the hospital on November 24. He expired today at 3:30 pm.
Rashtriya Swayamsevak Sangh expressed deep condolences on the demise of an eminent jurist. VR Iyer was one among them who appreciated RSS, its ideology and activities.
RSS Sahasarakaryavah Dattatreya Hosabale expressed condolences , said” Great Soul, May the soul rest in peace”.
श्रीमदभगवद्गीता के 5151 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर
परमपूज्य सरसंघचालक ने किया सबको अपनत्व देने का आह्वान
नई दिल्ली. जियो गीता परिवार तथा दिल्ली की धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं द्वारा यहां लाल किला मैदान में शुरू होने जा रहे गीता प्रेरणा महोत्सव के लिये भूमि पूजन किया गया. श्रीमदभगवद्गीता के 5151 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर 7 दिसंबर तक चलने वाले विभिन्न कार्यक्रमों का विधिवत प्रारम्भ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परमपूज्य सरसंघचालाक डॉ. मोहन जी भागवत द्वारा लाल किला मैदान पर 2 दिसंबर को किया गया.
परमपूज्य सरसंघचालक ने गीता के आलोक में जाति, पंथ, सम्प्रदाय, भाषा और प्रांत भेद को छोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि इन सबको छोड़ कर उस परमात्मा के प्रकाश में सबको अपनत्व देना चाहिये जो एक से अनेक बना है.
डॉ. भागवत ने कहा, “ गीता के प्रसिद्ध वाक्यों में से दो का आचरण भी हमने किया तो हमारा और दुनिया का जीवन बदल जायेगा. पहली बात भगवान कृष्ण ने बताई कि ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ यानी जो भी काम तुम्हारा है, उसको सत्यम, शिवम्, सुन्दरम उत्तम करना. किसी भी कार्य को व्यवस्थित किया जाता है, समय पर किया जाता है, सुन्दर रीति से किया जाता है. सबको अच्छा लगे ऐसे किया जाता है और उसका पूरा परिणाम मिले, इतना किया जाता है, वह योग है”.
“गीता में दूसरी महत्वपूर्ण बात कही गयी है- समत्वं योग उच्यते. सम रहो, संतुलित रहो, किसी एक ओर मत झुको, क्योंकि सब तुम्हारे हैं और कोई तुम्हारा नहीं है, वह आत्मा है, सर्वव्यापी है. सब समान हैं और सब में आप हैं. जात-पात, पंथ-सम्प्रदाय, भाषा-प्रांत यह सब छोड़ो. एक ही अनेक बना है. उस एकता के प्रकाश में सबको अपनत्व दो. यह जानकर रहो कि यह सब यहीं रहने वाले हैं, तुम स्वतन्त्र हो, अलग हो, स्वायत्त हो, तुम चले जाने वाले हो, इसलिये मोह में मत पड़ो. अनभिः स्नेह, ऐसा शब्द है गीता में. यह विषेश स्नेह मत करो, यह मोह होता है, पक्षपात होता है. स्नेह करो, अधिक स्नेह मत करो. अनभिस्नेही बनो”.
“सबको समान देखते हुये, आत्म सर्वभूतेषु मानते हुये, कर्म और कर्तव्य करो. तुम्हारा कर्तव्य और कर्म लोक-संग्रह के लिये होना चाहिये., शरीर, मन और बुद्धि के पीछे भागने वाला, जीवन के सुखों में लोभ-लालच यह अज्ञान है. सावधान रहकर, यह जानकर, कि तुम वह लालची नहीं हो, तुम सब यह प्राप्त कर्तव्य के नाते कर रहे हो, तुम आत्मा से, मन से इससे अलिप्त रहो”.
“तीसरी बात प्रसिद्ध है कि जो करते हो उसके परिणाम की मत सोचो. सबके साथ समदृष्टि रखकर, अपना कर्तव्य तुम कुशलतापूर्वक करते हो, उसका परिणाम या अपेक्षित परिणाम क्या होता है, यह बिलकुल मत सोचो, क्योंकि यह किसी के हाथ में नहीं. फ्लाइट जाने के लिये तैयार हो गयी, कोहरा आ गया, एक दो घण्टे के लिये, आप सबको अनुभव होगा इसका, इसमें दोष किसका, सबने अपना काम ठीक किया, लेकिन कोहरा आ गया. यह कौन तय कर सकता है? यह दुनिया का नियम है, दुनिया में यह होता रहता है, सब बाते तुम्हारे हाथ में नहीं रहतीं. तुम क्यों फल की आशा करते हो? कार्य अपने हाथ में है, फल प्रभु हाथ में”.
“इसलिये गीता का संदेश है कि इन सब बातों को मन में स्थिर रखने के लिये, एकान्त में साधना करो. सत्य की साधना करो. सत्य की साधना करते चले जाओ-करते चले जाओ. और लोकान्त में यानि जगत में, बाहर के जीवन में फल की अपेक्षा किये बिना परोपकार और सेवा की भावना से निष्काम पुरुषार्थ करो. यह परिस्थिति के उतार-चढ़ाव में कभी विषम नहीं होता, संतुलन डिगता नहीं. मोह, आकर्षणों और विकृतियों में वह भटकता नहीं. ऐसे धीर पुरुष बनो. इसलिये लौकिक जीवन में उसको यश मिले या न मिले. सारी दुनिया को सही रास्ते पर चलने के लिये प्रकाश देने वाले दीप-स्तम्भ की भांति उसका जीवन रहे. उसके लौकिक जीवन को जन्म-जन्मान्तर लोग याद करते रहें. हमारे देश की स्वतन्त्रता के लिये 1857 से भी पहले 1833 में प्रयास शुरू हुआ था. लेकिन सफलता तो 1947 में ही मिली. इतने लम्बे समय में भगत सिंह को क्या कहेंगे, क्या उनको यश मिला? उनके लौकिक जीवन के यश की स्केल पट्टी पर लोग कहेंगे कि भगत सिंह ने बलिदान तो किया पर यशस्वी नहीं हुये. लेकिन भगत सिंह के लिये यश और अपयश क्या है और हमारे लिये भगत सिंह का यश और अपयश क्या है. उसका जीवन हमारे लिये सब जीवनों को मार्गदर्शन करने वाला एक दीप स्तम्भ है. हमारे इन सब क्रांतिकारियों में अनेक के हाथ में तो फांसी के फंदे पर झूलते समय हाथ में गीता थी”.
गीता जयंती पर होने वाले कार्यक्रमों का परिचय देते हुए श्री ज्ञानानन्द जी ने बताया कि मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी एक ऐसी पावन तिथि है जो पूरे विश्व के लिये वंदनीय तिथि बन गयी है. मोक्षदा एकादशी इसी पावन तिथि को युद्ध भूमि में दोनों सेनाओं के बीच अर्जुन को निमित्त बनाकर सम्पूर्ण मानव मात्र, प्राणी मात्र के लिये गीता का दिव्य उपदेश हुआ. वह दिन आज का है.
श्री ज्ञानानन्द जी ने कहा कि आज ऐतिहासिक दिन है क्योंकि आज भगवदगीता के 5151 वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस ऐतिहासिक अवसर का यह ऐतिहासिक स्थल लाल किला ऐतिहासिक वैश्विक प्रेरणा का साक्षी बना. उन्होंने कहा कि गीता प्रेरणा महोत्सव 7 दिसंबर को इसलिये यहां मनाया जायेगा क्योंकि श्री गीता जयंती के दिन अनेक संस्थाओं के अनेक स्थानों पर कार्यक्रम भी होते हैं. लेकिन ऐसा भी एक निश्चय हुआ कि श्री गीता जयंती के दिन विभिन्न नगरों में गीता जी की सम्मान यात्रायें निकलें, सब अपने अपने नगरों में श्री गीता जयंती के कुछ कार्यक्रम करें. हमने भी अपनी गुरुभूमि अम्बाला में तथा उसके पश्चात प्रातः काल ज्योतिसर से लेकर करनाल फिर पानीपत में एक विशाल गीता जी की सम्मान यात्रा निकाली और ऐसा प्रत्येक नगर में एक संदेश दिया गया.
उन्होंने कहा कि आज सैकड़ों स्थानों विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में गीताजी की सम्मान यात्रायें निकल रही हैं. उन्होंने यह भी बताया कि 6 तारीख को युवा और बाल चेतना के लिये युवा चेतना के कार्यक्रम युवान आयोजित किये जायेंगे. जिसमें युवाओं को युवा ऊर्जा, नशा मुक्त समाज, राष्ट्र निर्माण, स्वच्छता अभियान, माता-पिता बुजुर्गों के सम्मान की प्रेरणा युवाओं को दी जायेगी.
इसी क्रम में 7 दिसंबर को लाल किला मैदान में राष्ट्र के प्रबुद्ध संत चेतना प्रेरणा देने के लिये उपस्थित होंगे, इसमें राष्ट्र के प्रमुख प्रबुद्ध लोग सम्मिलित रहेंगे. जिसमें यह संदेश दिया जायेगा कि गीता केवल ऐसा ग्रंथ नहीं है जो केवल पूजा के लिये है, अथवा मृत्यु के समय इसका अठ्ठारहवां अध्याय व्यक्ति को सुनाया जाये, बल्कि गीता घर-घर की शोभा बने, हर हृदय की शोभा बने, जीवन में इसको उतारा जाये, हर विद्यालय में, कार्यालय, चिकित्सालय में, न्यायालय में यह गीता पहुंचे. ऐसी आज हर क्षेत्र को आवश्यकता है. इस अवसर पर संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री इन्द्रेश कुमार जी ने गीता जयंती पर देश भर में होने वाले विभिन्न आयोजनों की जानकारी देते हुए कहा की इनसे गीता के मूल्यों की जनमानस में स्थापना होगी.
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